सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अविवाहित महिला की गर्भपात याचिका खारिज, भ्रूण को जीने का अधिकार

news28.in

          वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश बोराणा
नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने आज एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए 20 वर्षीय अविवाहित महिला की 27 सप्ताह से अधिक के गर्भ को समाप्त करने की याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि गर्भ में पल रहे भ्रूण को भी जीवित रहने का मौलिक अधिकार है।

महिला ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 3 मई के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति एस वी एन भट्टी और न्यायमूर्ति संदीप मेहता भी शामिल थे, ने याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

पीठ ने महिला के वकील से कहा, “हम क़ानून के विपरीत कोई आदेश पारित नहीं कर सकते।” न्यायमूर्ति गवई ने यह भी कहा, “गर्भ में पल रहे बच्चे को भी जीने का मौलिक अधिकार है। आप इस बारे में क्या कहते हैं?”

महिला के वकील ने तर्क दिया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) कानून मुख्यतः मां के स्वास्थ्य और अधिकारों पर केंद्रित है। उन्होंने कहा, ”यह कानून मां के हितों को ध्यान में रखते हुए बना है और उसी के आधार पर निर्णय लिए जाने चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश में गर्भपात कानूनों और भ्रूण के अधिकारों पर एक नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट का यह निर्णय न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।

इस फैसले का व्यापक प्रभाव होने की संभावना है, क्योंकि यह उन मामलों पर भी असर डाल सकता है जहां गर्भवती महिलाएं अविवाहित होती हैं या विशेष परिस्थितियों में गर्भपात कराना चाहती हैं। समाज और कानूनविदों के बीच इस मुद्दे पर गहन चर्चा और बहस जारी रहने की संभावना है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह भी दर्शाता है कि कानून केवल मां के अधिकारों को ही नहीं, बल्कि गर्भ में पल रहे भ्रूण के अधिकारों को भी महत्वपूर्ण मानता है। यह एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है, जिसमें दोनों पक्षों के अधिकारों और हितों को संतुलित करना आवश्यक है।

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