बुद्ध पूर्णिमा 2024 : महात्मा बुद्ध के घर-परिवार छोड़ने की क्या थी वजह-जानें

नई दिल्लीः बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा गौतम बुद्ध ने एक दिन अचानक घर-गृहस्थी का त्याग कर दिया. सांसारिक और पारिवारिक मोह-माया का त्याग कर वे जंगल की ओर चले गए.बुद्ध ने बोधि वृक्ष के नीच करीब छह सालों तक तप किया और इस तरह उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई. ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने लोगों के बीच अहिंसा, प्रेम, शांति और त्याग का संदेश देकर समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया.कहा जाता है कि गौतम बुद्ध का जन्म ऐसे काल में हुआ जब समाज में अत्याचार, भेद-भाव, अशांति, अनाचार, अंधविश्वास और रूढ़ियां अपना जड़ जमा रही थी. तब इन कुरीतियों को दूर करने के लिए बुद्ध जैसे महापुरुष का जन्म हुआ. बुद्ध ही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने इन कुरीतियों की बेड़ियों से लोगों को मुक्त कराया.

महात्मा बुद्ध का असली नाम राजकुमार सिद्धार्थ

महात्मा बुद्ध का असली नाम राजकुमार सिद्धार्थ था. कहा जाता है कि वे बचपन से ही अन्य बच्चों से काफी अलग थे. वह बचपन में भी नटखट और चंचल होने के बजाय शांत व गंभीर स्वभाव के थे और बहुत कम बोलते थे. उन्हें अधिकांश समय एकांत में बैठना और चिंतन करना अच्छा लगता था.जैसे जैसे गौतम बुद्ध बड़े होने लगे उनका यह स्वभाव और भी जटिल होता गया. इस तरह से धीरे-धीरे सासांरिक सुखों के प्रति उनकी रुचि भी खत्म होने लगी. उनका विवाह कर दिया और कुछ समय बाद एक पुत्र भी हुआ. लेकिन बुद्ध का वैराग्य भाव बढ़ता ही चला गया. इस तरह एक दिन बुद्ध ने चुपचाप गृह त्याग कर दिया.

कौन थे महात्मा गौतम बुद्ध

महात्मा बुद्ध राजा शुद्धोधन के बेटे थे, जोकि शाक्य गणराज्य के राजा थे. बुद्ध की माता का नाम मायादेवी थी. जन्म के समय माता-पिता ने बुद्ध का नाम राकुमार सिद्धार्थ रखा था. बुद्ध बचपन से ही शांत और गंभीर स्वभाव के थे. वे अपना अधिकांश समय एकांत में बैठने और चिंतन करने में बिताते थे. राजकुमार होने के बावजूद भी सांसारिक सुखों में उनकी कोई रूचि नहीं थी. जैसे-जैसे बुद्ध बड़े होने लगे उनकी सांसारिक रूचि भी खत्म होने लगी.

गौतम बुद्ध का विवाह

कुछ समय बाद बुद्ध का विवाह कोलीय वंश के राजा सुप्पबुद्ध की बेटी यशोधरा से हुआ. बुद्ध और यशोधरा का एक पुत्र भी हुआ, जिसका नाम राहुल था. लेकिन विवाह के बाद भी बुद्ध का वैराग्य भाव बढ़ता जा रहा था और सांसारिक सुखों के प्रति उनकी रुचि खत्म हो रही थी. इस तरह एक दिन बुद्ध अपनी पत्नी और बेटे को छोड़कर चुपचाप जंगल की ओर चले गए.

बुद्ध ने क्यों छोड़ा घर?

अपरिग्रह होने पर कुछ लोग क्षमता के अनुसार अपनी संपत्ति छोड़ देते हैं. क्योंकि वे आत्मा से जुड़ सके. परिग्रह यानी सम्पत्ति के साथ जुड़ाव होने से आत्मा के साथ जुड़ाव नहीं हो सकता और आध्यात्मिक आनंद नहीं मिलता. कुछ लोगों का लक्ष्य जीवन में केवल ज्ञान को प्राप्त करना होता है, तो ऐसे लोग अपरिग्रह को अपनाते हैं. यानी आत्मा के अलावा अन्य किसी भी वस्तु से जुड़ाव नहीं रख पाते. ना घर, ना परिवार, ना संपत्ति और ना कोई अन्य वस्तु. बुद्ध के भी गृह त्याग का यही कारण था. वे केवल अपनी आत्मा से जुड़ना चाहते थे.

महात्मा बुद्ध की तपस्या

बुद्ध के मन में कई प्रश्न थे और इन्हीं प्रश्नों का उत्तर ढूढ़ने के लिए उन्होंने तपस्या शुरू की. लेकिन सालों तपस्या के बाद भी उन्हें उनके प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला. तब वे एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए और ठान लिया कि सत्य को जाने बिना यहां से नहीं उठेंगे. इसी पेड़ को अब बोधि वृक्ष के नाम से जाना जाता है. इस पेड़ के नीचे ही बुद्ध को पूर्ण व दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई. इस तरह से ज्ञान व सत्य की खोज में बुद्ध को छह साल लग गए और 35 वर्ष की आयु में वे सिद्धार्थ गौतम से महात्मा गौतम बुद्ध बन गए.

महात्मा गौतम बुद्ध की शिक्षा

महात्मा गौतम बुद्ध ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत राजमहल से की थी। इसके बाद उनके पिता शद्धोधन ने उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरु विश्वामित्र के पास भेजा दिया था। गौतम बुद्ध ने गुरु विश्वामित्र से उपनिषद और वेदों की शिक्षा प्राप्त की थी।

ज्ञान की प्राप्ति

गृहत्याग के बाद उन्होंने सात दिन ‘अनुपीय’ नामक ग्राम में बिताए। फिर गुरु की खोज में वह मगध की राजधानी पहुंचे जहां कुछ दिनों तक वह ‘आलार कालाम’ नामक तपस्वी के पास रहे। इसके बाद वह एक आचार्य के साथ भी रहे लेकिन उन्हें कहीं संतोष नहीं मिला। अंत में ज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने स्वयं ही तपस्या शुरू कर दी। कठोर तप के कारण उनकी काया जर्जर हो गई थी लेकिन उन्हें अभी तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई थी। घूमते-घूमते वह एक दिन गया में उरुवेला के निकट निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर पहुंचे और वहां एक पीपल के वृक्ष के नीचे स्थिर भाव में बैठ कर समाधिस्थ हो गए।इसे बौद्ध साहित्य में ‘संबोधि काल’ कहा गया है। छ: वर्षों तक समाधिस्थ रहने के बाद जब उनकी आंखें खुलीं और उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई, वह वैशाख पूर्णिमा का दिन था और वह महात्मा गौतम बुद्ध कहलाए। उस स्थान को ‘बोध गया’ व पीपल का पेड़ बोधि वृक्ष कहा जाता है।

गौतम बुद्ध के अनमोल विचार

-इंसान अपने जीवन में बुराई से बुराई को खत्म नहीं कर सकता। बुराई को समाप्त करने के लिए व्यक्ति को प्रेम की मदद लेनी पड़ती है। प्रेम से सभी चीजों को जीता जा सकता है।

-इंसान को बीती हुई बात में उलझना नहीं चाहिए और न ही जीवन के बारे में सपने देखकर उसमें उलझना चाहिए। क्योंकि यही वजह है कि इंसान की चिंता का कारण बन सकता है, जिससे इंसान मानसिक रूप से परेशान हो जाता है।

-इंसान के लिए हर दिन एक नया होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बीता हुआ कल कितनी परशानियों से भरा था। हर दिन का एक नया सवेरा एक नई उम्मीद लेकर पैदा होता है।

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