नीतीश-नायडू के साथ आसान नहीं होगी बीजेपी सरकार की राह?,कैसे हल निकालेंगे PM मोदी-शाह?

नई दिल्लीः लोकसभा चुनाव 2024 की मतगणना के नतीजों ने काफी चौंकाया है। इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले NDA को पूर्ण बहुमत मिला है, लेकिन सरकार बनाने के बाद भाजपा को सहयोगी दलों का खास ध्यान रखना पड़ेगा। NDA को 295 सीटें मिली हैं। कांग्रेस के INDIA अलायंस को 242 सीटें मिली हैं।

BJP NDA सरकार की राह नीतीश-नायडू के साथ आसान नहीं होगी

दोनों अलायंस के लिए इस समय बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू सबसे अहम कड़ी हैं। दोनों शख्स दोनों अलायंस के लिए सरकार बनाने में ‘किंगमेकर’ साबित हो सकते हैं। दोनों चाहें तो देश में कांग्रेस-INDIA अलायंस की सरकार बन जाए। यह दोनों चाहें तो BJP NDA की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन जाए, लेकिन BJP NDA सरकार की राह नीतीश-नायडू के साथ आसान नहीं होगी।

दोनों के साथ खराब रहे भाजपा के संबंध

राजनीतिक इतिहास की बात करें तो TDP प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू और JD(U) प्रमुख नीतीश कुमार के साथ भाजपा के संबंध खराब रहे हैं। गठबंधन सरकार में सामाजिक क्षेत्र या आर्थिक क्षेत्र में किसी भी तरह के बड़े सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। 10 साल बाद भाजपा लोकसभा चुनाव में बहुमत से चूक गई, लेकिन सहयोगी दलों के साथ NDA गठबंधन सरकार बनाने की राह पर है, लेकिन यह गठबंधन सहयोगियों TDP और JD(U) पर निर्भर करेगा, जो भविष्य में अहम फैसलों और प्रोजेक्टों को लेकर भाजपा से असहमत हो सकते हैं।

एक राष्ट्र एक चुनाव की टैगलाइन

खासकर एक देश एक चुनाव, परिसीमन (Delimitation) और समान नागरिक संहिता (CAA) जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर। नई सरकार से यह अपेक्षा की जा रही थी कि वह एक राष्ट्र एक चुनाव की टैगलाइन के तहत एक साथ चुनाव कराने की तैयारी करेगी, जो स्वयं नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट है, लेकिन नई सरकार में नए सहयोगियों के साथ इस प्रोजेक्ट को पूरा करना शायद संभव न हो, क्योंकि एक राष्ट्र एक चुनाव लागू करने को लेकर मतभेद हो सकते हैं।

नायडू ने मोदी को ‘कट्टर आतंकवादी’ कह दिया था

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न मिलने पर TDP ने मोदी सरकार का हिस्सा होने के बावजूद भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ दिया था। इससे उनके रिश्ते इतने खराब हो गए थे कि नायडू ने मोदी को ‘कट्टर आतंकवादी’ तक कह दिया था। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद नायडू ने भाजपा के साथ अपने संबंधों को फिर से बहाल करने के प्रयास किए, लेकिन इसके बावजूद, भाजपा ने उन्हें NDA में शामिल नहीं किया।

नीतीश कुमार अभी तक कब-कब किसके साथ रहे

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का हिस्सा थे, ने सबसे पहले 2014 में मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के कदम पर आपत्ति जताई तो भाजपान ने JD(U) के साथ अपने संबंध तोड़ लिए थे। बाद में वे NDA में वापस आ गए, लेकिन 2022 में उन्होंने फिर से संबंध तोड़ लिए और RJD-कांग्रेस के साथ मिलकर राज्य सरकार बना ली, लेकिन इस साल की शुरुआत में ही वे फिर से NDA में वापस आ गए।

एनडीए गठबंधन में इस बार जदयू और टीडीपी की भूमिका अहम

लोकसभा चुनाव के पहले ही भाजपा ने यह साफ कर दिया था कि मोदी सरकार 3.0 में यूनिफॉर्म सिविल कोड कोर एजेंडे में शामिल होगा। उत्तराखंड में भाजपा सरकार पहले ही इसे लागू कर चुकी है। ऐसे में माना जा रहा था कि केंद्र की सत्ता वापस में लौटने के बाद भाजपा प्राथमिकता के साथ इसे आगे बढ़ाएगी। लेकिन अब सहयोगी दल भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू भाजपा पर इस निर्णय को वापस लेने पर दबाव बना सकते है। भाजपा के एजेंडे में वन नेशन, वन इलेक्शन भी शामिल हैं। इस संबंध में बनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी हैं। 47 राजनीतिक दलों में से 32 दल तैयार हैं। एनडीए गठबंधन में इस बार जदयू और टीडीपी की भूमिका अहम है। ऐसे में वे भाजपा के इस एजेंडे पर भी रोड़ा बन सकते हैं।

सरकार को समर्थन देने के बदले में अहम मंत्रालय की मांग

भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में बिहार के सीएम नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू केंद्र की सरकार में अहम मंत्रालय के लिए दबाव बनाएंगे। 2019 के चुनाव के बाद नीतीश कुमार ने भाजपा की सरकार में शामिल होने से इंकार कर दिया था। हालांकि बाद में नीतीश की पार्टी से आरसीपी मंत्री बने थे। जबकि राज्यसभा में उपसभापति का पद भी जेडीयू को दिया था। बिहार में अक्टूबर-नवंबर 2025 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है। ऐसे में जेडीयू भाजपा से प्रमुख मंत्रालय की डिमांड कर सकते है। इसके अलावा चंद्रबाबू नायडू की पार्टी 18 सांसद चुनाव जीते हैं। वे भी सरकार को समर्थन देने के बदले में अहम मंत्रालय मांग सकते है।

नीतीश कुमार क्या मारेंगे पलटी?

नीतीश कुमार की राजनीति को देखते हुए कब क्या फैसला लेंगे, ये उनके सिवा कोई नहीं जानता है. नीतीश कुमार बीजेपी और कांग्रेस दोनों के साथ रह चुके हैं और बिहार में सरकार चला चुके हैं. नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के साथ ही अपनी सियासी पारी की शुरुआत की थी, लेकिन कुर्सी के लिए दोनों की सियासी राह अलग हो गई है. नीतीश कुमार ने 1998 से लेकर 2013 तक बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए के साथ रहे, लेकिन 2014 में पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नाम को आगे बढ़ाया तो एनडीए से नाता तोड़कर अलग हो गए थे.

नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन के लिए संजीवनी का काम करेंगे

जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होने के बाद आरजेडी के प्रमुख लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर बिहार के 2015 चुनाव लड़े थे. नीतीश-लालू यादव की जोड़ी ने बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी का सफाया कर दिया था. नीतीश ने 2017 में एक बार फिर सियासी पलटी मारी और आरजेडी-कांग्रेस के साथ गठबंधन तोड़कर बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर बिहार में सरकार बना ली. नीतीश ने 2020 का विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़े, लेकिन बिहार में दो साल सरकार चलाने के बाद 2022 में सियासी पलटी मारी. नीतीश कुमार ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर कांग्रेस, आरजेडी और लेफ्ट पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बना ली, जिसे इंडिया गठबंधन का नाम दिया गया. इंडिया गठबंधन की पहली बैठक नीतीश कुमार की मेजबानी में ही पटना में हुई थी, लेकिन बाद में लोकसभा चुनाव के ठीक पहले उन्होंने फिर से बीजेपी के साथ हाथ मिला लिया और एनडीए का हिस्सा बन गए. नीतीश एनडीए के साथ लोकसभा का चुनाव लड़े और अपने कोटे की सीटें जीतने में सफल होती दिख रही है. ऐसे में नीतीश कुमार की भूमिका काफी अहम हो गई है. एनडीए के साथ रहते हैं तो बीजेपी के लिए सियासी मुफीद होंगे, अगर पलटी मारते हैं तो फिर इंडिया गठबंधन के लिए संजीवनी का काम करेंगे.

टीडीपी क्या सियासी पाला बदलेगी?

आंध्र प्रदेश के सियासी बाजी पलटने वाले टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू 2024 के किंगमेकर बनकर उभरे हैं. चंद्रबाबू नायडू ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़े हैं और 16 सीटें जीतने की स्थिति में है. नायडू 1998 में बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर एनडीए का हिस्सा बने थे, जिसके बाद से वो 2018 तक दोस्ती रखी. आंध्र प्रदेश के विशेष राज्य का दर्ज देने की मांग कर बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया और विपक्षी खेमे का हिस्सा बने. 2019 में कांग्रेस के संग मिलकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़े. हालांकि, चंद्रबाबू नायडू चुनाव नहीं जीत सके जबकि 2019 में बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों को एक लाने के लिए काफी मशक्कत की थी.2024 के लोकसभा और आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चंद्रबाबू नायडू का जेल जाना सियासी मुफीद साबित हुई. चुनाव से ठीक पहले नायडू ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया और उन्हें लोकसभा और विधानसभा दोनों जगह फायदा हुआ. चंद्रबाबू नायडू लोकसभा चुनाव में किंगमेकर बनकर उभरे हैं, जिनके दम पर ही बीजेपी केंद्र में सरकार बन सकती है. नायडू अगर एनडीए से अलग होते हैं तो फिर बीजेपी के लिए सरकार बनाना मुश्किल हो जाएगा. ऐसे में देखना है कि नायडू और नीतीश कुमार क्या सियासी गुल खिलाते हैं?

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